सुप्रीम कोर्ट ने केरल कांग्रेस के पदाधिकारियों से अवमानना नोटिस पर जवाब मांगा है।
केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को निशाना बनाकर की गई पोस्ट अब कानूनी विवाद का विषय बन गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केरल कांग्रेस के पदाधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने पार्टी की ओर से पोस्ट हटाने और बिना शर्त माफी मांगने की दलील भी सुनी, लेकिन साथ ही यह सवाल उठाया कि माफी वास्तव में कितनी गंभीरता से मांगी गई है।
शुक्रवार, 6 नवंबर को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने वकील विनीत जिंदल की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में कांग्रेस की केरल इकाई के आधिकारिक एक्स अकाउंट @INCKerala पर डाली गई सामग्री को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करने की मांग की गई थी।
कांग्रेस की दलील- पदाधिकारियों की मंजूरी के बिना डाली गई थी पोस्ट
सुनवाई के दौरान केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि विवादित पोस्ट पदाधिकारियों की अनुमति के बिना अपलोड की गई थी। वकील ने यह भी कहा कि मामला सामने आने के बाद पोस्ट को हटा दिया गया है और पार्टी ने बिना शर्त माफी मांग ली है।
कांग्रेस की इस दलील पर न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अदालत यह देखेगी कि माफी केवल कलम से लिखी गई है या दिल से मांगी गई है।
अदालत की इस टिप्पणी से साफ हुआ कि पीठ केवल पोस्ट हटाए जाने और माफी दिए जाने के आधार पर मामले को खत्म मानने के पक्ष में नहीं है। वह इस पूरे घटनाक्रम और माफी की वास्तविक गंभीरता को परखना चाहती है।
अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर न्यायपालिका को डराया नहीं जा सकता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि संविधान से ऊपर कोई व्यक्ति या राजनीतिक संगठन नहीं है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता को राजनीतिक सुविधा के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक फैसलों की आलोचना करने का अधिकार सभी को है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल न्यायपालिका को डराने-धमकाने या न्याय प्रशासन में दखल देने के लिए नहीं किया जा सकता।
पीठ की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और आलोचना की जगह है, लेकिन किसी भी अभिव्यक्ति के जरिए न्यायिक संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती।
अदालत ने कानून के शासन को बताया अपनी ताकत
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि अदालत का अधिकार किसी राजनीतिक दल या संगठन के समर्थन पर निर्भर नहीं करता, बल्कि कानून के शासन पर आधारित है। न्यायपालिका की गरिमा और स्वतंत्रता को कमजोर करने के प्रयासों से सख्ती से निपटने की जरूरत है।
पीठ ने न्यायिक संयम को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही। अदालत के अनुसार, न्यायिक संयम को संस्थागत कमजोरी समझना गलत होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायपालिका के अधिकार या उसकी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली गतिविधियों को अनदेखा कर दिया जाए।
1971 के अवमानना कानून के तहत कार्रवाई पर मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सभी पदाधिकारियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। इसमें पार्टी अध्यक्ष और सचिव भी शामिल हैं। अदालत ने उनसे पूछा है कि न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
इस मामले में पीठ ने पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से छूट दे दी है। हालांकि, उन्हें नोटिस का जवाब देना होगा।
अनुच्छेद 129 के तहत शक्तियों के इस्तेमाल पर भी विचार
सुप्रीम कोर्ट अब यह भी जांच करेगा कि विवादित सोशल मीडिया सामग्री के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए या नहीं। इसी प्रक्रिया के तहत अदालत यह तय करेगी कि मामले में अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाने का आधार बनता है या नहीं।
फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। केरल कांग्रेस ने पोस्ट हटाने और बिना शर्त माफी मांगने की बात कही है, जबकि अदालत ने पदाधिकारियों से जवाब मांगते हुए इस मामले को गंभीरता से लिया है।
