अनोझान शिवरासा की सऊदी अरब में मौत की सजा पलटने का मामला
सऊदी अरब में श्रीलंकाई नागरिक अनोझान शिवरासा की मौत की सजा पलटने का मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर को उनके खिलाफ मौत की सजा वाले फैसले को पलट दिया। श्रीलंकाई सरकार ने इसे अपने राजनयिक और कानूनी प्रयासों की बड़ी सफलता बताया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ जब सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दी गई। दोनों मामलों के सामने आने के बाद विदेशों में अपने नागरिकों के लिए सरकारों की कांसुलर और कानूनी मदद को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
अनोझान शिवरासा पर क्या आरोप था?
Human Rights Watch के अनुसार, 24 वर्षीय श्रीलंकाई प्रवासी कर्मचारी अनोझान शिवरासा को फेसबुक पर की गई एक टिप्पणी से जुड़े कथित ईशनिंदा मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। शुरुआत में उन्हें पांच साल की जेल की सजा मिली थी, लेकिन बाद में अपील अदालत ने मौत की सजा सुना दी।
इसके बाद श्रीलंका ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कानूनी और राजनयिक स्तर पर हस्तक्षेप किया।
श्रीलंका ने क्या किया?
श्रीलंका की ओर से विशेष कानूनी टीम को मामले में लगाया गया। श्रीलंकाई राजदूत और अन्य अधिकारियों ने भी मामले में सक्रिय भूमिका निभाई।
श्रीलंकाई वकीलों की एक टीम सऊदी अरब गई और सुप्रीम कोर्ट में अपील की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। रिपोर्टों के अनुसार टीम में वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ शामिल थे।
इसके बाद 13 अक्टूबर को सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा वाले फैसले को पलट दिया।
क्या अनोझान पूरी तरह बरी हो गए?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
मौत की सजा हटना और पूरा केस खत्म होना एक ही बात नहीं है।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया बाकी है। एक रिपोर्ट के अनुसार मामला दोबारा संबंधित आपराधिक अदालत के सामने जा सकता है।
इसलिए इसे फिलहाल मौत की सजा से राहत के रूप में देखना ज्यादा सही होगा, न कि पूरे मामले से अंतिम बरी होना।
फिर बांग्लादेश के दो नागरिकों के मामले में क्या हुआ?
14 अक्टूबर को सऊदी अधिकारियों ने दो बांग्लादेशी नागरिकों के निष्पादन की घोषणा की। दोनों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर के रूप में हुई।
सऊदी गृह मंत्रालय के अनुसार दोनों को मक्का की एक मस्जिद में कथित अशोभनीय कृत्य से जुड़े मामले में दोषी ठहराया गया था और ताज़ीर के तहत मौत की सजा लागू की गई।
हालांकि, बांग्लादेशी कांसुलर दस्तावेजों में दोनों के खिलाफ अलग-अलग आरोप और अगस्त 2023 से हिरासत में होने की जानकारी सामने आई है।
ढाका को कब पता चला?
बांग्लादेश की सरकार का कहना है कि उसे दोनों नागरिकों की मौत की सजा और निष्पादन की जानकारी 14 अक्टूबर को ही मिली, यानी सजा लागू होने से पहले कोई सूचना नहीं मिली थी।
इसके बाद ढाका ने सऊदी अधिकारियों से मामले की विस्तृत जानकारी मांगी है और फैसलों से जुड़े दस्तावेजों की मांग की है।
दोनों मामलों से क्या सीख?
अनोझान शिवरासा और दो बांग्लादेशी नागरिकों के मामलों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा, क्योंकि दोनों के आरोप और कानूनी प्रक्रियाएं अलग हैं।
फिर भी इन घटनाओं से यह सवाल जरूर उठता है कि विदेशों में गंभीर कानूनी मामलों का सामना कर रहे प्रवासी नागरिकों के लिए कांसुलर पहुंच, कानूनी प्रतिनिधित्व और समय पर राजनयिक हस्तक्षेप कितना महत्वपूर्ण है।
श्रीलंका के मामले में सरकार ने राजदूत, विदेश मंत्रालय और विशेषज्ञ कानूनी टीम के स्तर पर सक्रिय प्रयास किए और अंततः मौत की सजा हट गई।
वहीं बांग्लादेश अब सऊदी सरकार से उन दो नागरिकों के मामलों की विस्तृत जानकारी मांग रहा है।
