पंजाब के पायल में दशहरे पर रावण दहन की जगह लंकेश की पूजा करने की अनोखी परंपरा।
दशहरा यानी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। देश के अधिकांश हिस्सों में इस दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है। लेकिन पंजाब के लुधियाना जिले के पायल क्षेत्र में एक ऐसी जगह है, जहां दशहरे पर रावण को जलाने की बजाय उसकी पूजा की जाती है।
करीब 190 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा के कारण यह स्थान हर साल दशहरे के दौरान चर्चा में आ जाता है। यहां रावण की लगभग 25 फीट ऊंची पक्की प्रतिमा स्थापित है।
संतान प्राप्ति से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में रावण की पूजा से जुड़ी सबसे बड़ी मान्यता संतान प्राप्ति की है। श्रद्धालु यहां पहुंचकर प्रतिमा के सामने पूजा करते हैं और संतान प्राप्ति की मनोकामना मांगते हैं।
यह मान्यता स्थानीय धार्मिक विश्वास पर आधारित है और इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
कहानी करीब दो सदियों पुरानी
मंदिर से जुड़ी कथा के अनुसार हकीम बीरबल दास को संतान नहीं थी। निराश होकर उन्होंने संन्यास ले लिया था। बाद में एक संत ने उन्हें श्रीरामलीला का आयोजन करने और परिवार में वापस लौटने के लिए प्रेरित किया।
कहा जाता है कि इसके बाद उनके परिवार में पुत्र का जन्म हुआ। इसी कहानी को मंदिर की स्थापना और यहां की रावण प्रतिमा से जुड़ी परंपरा के साथ जोड़ा जाता है।
बताया जाता है कि वर्ष 1833 में पायल में श्रीराम मंदिर का निर्माण करवाया गया और बाद में रावण की पक्की प्रतिमा स्थापित की गई।
दशहरे पर होती है पूजा, नहीं जलता पुतला
देशभर में जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं इस मंदिर में हर साल वही स्थायी प्रतिमा सजाई जाती है।
प्रतिमा पर रंग-रोगन किया जाता है और दशहरे के दिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। यही वजह है कि पंजाब की यह जगह दशहरे की सामान्य परंपरा से बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
शराब और रक्त चढ़ाने की भी चर्चा
इस मंदिर से जुड़ी कुछ स्थानीय परंपराएं बेहद अलग हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुछ श्रद्धालु रावण की प्रतिमा पर शराब और बकरे का खून अर्पित करते हैं। कुछ लोगों द्वारा अपनी मन्नत के लिए रक्त चढ़ाने की परंपरा का भी उल्लेख किया जाता है।
हालांकि यह स्थानीय प्रथा है और इसे मंदिर आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु की सामान्य पूजा-पद्धति नहीं माना जा सकता।
क्या श्रीलंका से जुड़ सकता है यह मंदिर?
मंदिर के संरक्षण और विकास को लेकर श्रीलंका सरकार की ओर से सहयोग के प्रस्ताव की बात भी सामने आई है। धार्मिक पर्यटन के लिहाज से इस मंदिर को विकसित करने और इसे रामायण सर्किट से जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा होती रही है।
अगर ऐसी पहल आगे बढ़ती है तो पायल का यह मंदिर पंजाब के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान बना सकता है।
रावण की पूजा के पीछे क्या संदेश?
मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक यहां रावण की पूजा उसके बुरे कर्मों को सही ठहराने के लिए नहीं होती। इसके पीछे एक अलग संदेश बताया जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि रावण विद्वान था और वेदों का ज्ञाता था, लेकिन उसके गलत कर्मों ने उसकी पहचान को बदल दिया। इसलिए यहां यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि व्यक्ति के बजाय उसकी बुराइयों का अंत होना चाहिए।
यही वजह है कि दशहरे पर यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है और रामलीला के माध्यम से लोगों को अच्छे कर्म करने तथा गलत रास्ते से बचने का संदेश दिया जाता है।
