जेल से चुनाव जीतने वाले नेता
भारतीय राजनीति में कई ऐसे चुनाव हुए हैं, जिनमें उम्मीदवार जेल की चारदीवारी के अंदर बंद थे, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें भारी समर्थन देकर जीत दिलाई। अब पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में आम आदमी पार्टी ने जेल में बंद मंत्री संजीव अरोड़ा को लुधियाना पश्चिम से टिकट देकर इस राजनीतिक इतिहास को फिर सुर्खियों में ला दिया है। इससे पहले सिमरनजीत सिंह मान से लेकर अमृतपाल सिंह और इंजीनियर राशिद तक कई नेता जेल में रहते हुए चुनाव जीत चुके हैं।
आम आदमी पार्टी की 40 उम्मीदवारों वाली पहली सूची सामने आने के बाद पंजाब की राजनीति में संजीव अरोड़ा का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। प्रवर्तन निदेशालय ने मई 2026 में कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें गिरफ्तार किया था। वह फिलहाल गुरुग्राम की भोंडसी जेल में बंद हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जेल में बंद व्यक्ति चुनाव कैसे लड़ सकता है और क्या मतदाता ऐसे उम्मीदवार को जीत भी दिला सकते हैं? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि जेल में बंद रहना अपने आप में चुनाव लड़ने की अयोग्यता नहीं है। कई नेताओं ने इस स्थिति में भी शानदार चुनावी प्रदर्शन किया है।
आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ चर्चित नेताओं के बारे में।
1. सिमरनजीत सिंह मान: 94 प्रतिशत वोट लेकर रचा था इतिहास
पंजाब में जेल से चुनाव जीतने का सबसे चर्चित उदाहरण सिमरनजीत सिंह मान का है। वर्ष 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
जेल में रहते हुए उन्होंने शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) का गठन किया। वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने तरनतारन सीट से अपनी किस्मत आजमाई।
इस चुनाव में मान को 5,27,207 वोट मिले। यह कुल पड़े मतों का लगभग 94 प्रतिशत था। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को करीब साढ़े चार लाख वोटों से पीछे छोड़ दिया।
यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि वह उस समय जेल में थे और व्यक्तिगत रूप से चुनाव प्रचार में शामिल नहीं हो पाए थे।
2. अतिंदरपाल सिंह: पटियाला में निर्दलीय उम्मीदवार की जीत
1989 का लोकसभा चुनाव पंजाब के लिए एक और वजह से याद किया जाता है। इसी चुनाव में अतिंदरपाल सिंह ने पटियाला लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था।
दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में आरोपी बनाए जाने के बाद वह जेल में थे। सिमरनजीत सिंह मान ने अपने उम्मीदवार को उनके समर्थन में चुनाव से हटा लिया था।
अतिंदरपाल सिंह को 2,94,172 वोट मिले और उन्होंने कुल मतदान का 46.59 प्रतिशत हासिल किया। इस तरह जेल में रहते हुए उन्होंने भी लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की।
3. जॉर्ज फर्नांडिस: हथकड़ी वाली तस्वीर बनी थी चुनावी पहचान
आपातकाल के दौर में जॉर्ज फर्नांडिस की गिरफ्तारी और उसके बाद का चुनावी मुकाबला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अहम अध्याय है।
वर्ष 1977 में उन्होंने बिहार की मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उस समय वह तिहाड़ जेल में बंद थे।
चुनाव प्रचार के दौरान उनकी हथकड़ी पहने हुए तस्वीर और पीछे जेल की सलाखों का दृश्य बेहद चर्चित हुआ। इस तस्वीर ने आपातकाल के खिलाफ राजनीतिक माहौल को और प्रभावशाली बनाया।
मतदाताओं ने उन्हें भारी समर्थन दिया और जॉर्ज फर्नांडिस ने करीब 3.34 लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की। आगे चलकर वह देश के रक्षा मंत्री भी बने।
4. मुख्तार अंसारी: मऊ सीट से जेल में रहते हुए जीते
उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता मुख्तार अंसारी ने वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में मऊ सीट से बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था।
उस समय वह जेल में बंद थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने चुनाव में जीत दर्ज की। उनका यह चुनावी प्रदर्शन जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने के चर्चित उदाहरणों में शामिल हो गया।
5. कल्पनाथ राय: जेल में रहते हुए घोसी से हासिल की जीत
पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय का नाम भी जेल से चुनाव जीतने वाले नेताओं में शामिल है।
वर्ष 1996 के चुनाव में वह टाडा मामले में जेल में बंद थे। इसके बावजूद उन्होंने घोसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस मुकाबले में उन्होंने मुख्तार अंसारी को हराया था।
6. आजम खान: जेल से भी रामपुर की जनता का मिला समर्थन
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान ने वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जेल में रहते हुए रामपुर सीट से चुनाव लड़ा था।
उनके सामने कई राजनीतिक चुनौतियां थीं, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें जीत दिलाई। इसी चुनाव में कैराना विधानसभा सीट से सपा उम्मीदवार नाहिद हसन ने भी जेल में रहते हुए चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
बाद में एक मामले में सजा होने के कारण आजम खान की विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई थी।
7. अमृतपाल सिंह: डिब्रूगढ़ जेल में रहते हुए संसद तक पहुंचे
वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव भी जेल में बंद उम्मीदवारों की जीत के कारण खास चर्चा में रहा।
पंजाब की खडूर साहिब लोकसभा सीट से वारिस पंजाब दे के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। वह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत असम की डिब्रूगढ़ जेल में बंद थे।
इसके बावजूद उन्होंने 1.97 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की। इस नतीजे ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा।
8. इंजीनियर राशिद: उमर अब्दुल्ला को हराकर दर्ज की जीत
जम्मू-कश्मीर की बारामुला लोकसभा सीट पर वर्ष 2024 में एक और बड़ा चुनावी उलटफेर देखने को मिला।
जेल में बंद इंजीनियर राशिद ने चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला को हरा दिया। वह आतंकवाद के वित्तपोषण से जुड़े मामले में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद थे।
अमृतपाल सिंह और इंजीनियर राशिद दोनों को सांसद पद की शपथ लेने के लिए अदालत से अस्थायी रिहाई की अनुमति मिली थी।
जेल में बंद उम्मीदवार को चुनाव लड़ने की अनुमति कैसे मिलती है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में चुनाव लड़ने और मतदान करने के नियम एक जैसे नहीं हैं।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) के अनुसार जेल में बंद या पुलिस की वैध हिरासत में मौजूद व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में मतदान नहीं कर सकता। निवारक हिरासत में रखे गए लोगों को इस नियम से छूट दी गई है।
लेकिन केवल जेल में बंद होने से किसी व्यक्ति की चुनाव लड़ने की पात्रता अपने आप खत्म नहीं होती। यदि किसी उम्मीदवार को ऐसी सजा मिलती है, जिससे वह कानून के अनुसार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है, तो उस पर अलग नियम लागू होते हैं।
संजीव अरोड़ा पर टिकी रहेंगी पंजाब की राजनीतिक निगाहें
अब आम आदमी पार्टी ने संजीव अरोड़ा को लुधियाना पश्चिम से उम्मीदवार घोषित कर पंजाब की चुनावी राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।
सिमरनजीत सिंह मान, जॉर्ज फर्नांडिस, अमृतपाल सिंह और इंजीनियर राशिद जैसे नेताओं का इतिहास बताता है कि उम्मीदवार की जेल में मौजूदगी हमेशा चुनावी हार की वजह नहीं बनती।
हालांकि, संजीव अरोड़ा के मामले में चुनावी परिणाम क्या होंगे, यह मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा। फिलहाल उनकी उम्मीदवारी ने पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक चर्चा को एक नया मोड़ दे दिया है।
