1.51 लाख दीपों से सजी पुलिस लाइन में काशीवासियों ने अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी।
देश की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीर सपूतों को याद करते हुए वाराणसी में भव्य दीपांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुलिस लाइन में ‘एक दीया बलिदानियों के नाम’ के तहत 1.51 लाख दीप जलाए गए। शाम ढलते ही पूरा परिसर दीपों की रोशनी से आलोकित हो उठा और बड़ी संख्या में पहुंचे लोगों ने अमर बलिदानियों को श्रद्धासुमन अर्पित किए।
पुलिस कमिश्नरेट और काशीवासियों के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में देशभक्ति के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की भी झलक दिखाई दी। पुलिस विभाग के अधिकारियों और जवानों के परिवारों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों तक, हर वर्ग ने इसमें अपनी भागीदारी निभाई।
बलिदानियों की याद में रोशन हुआ पुलिस लाइन परिसर
गुरुवार दोपहर बाद से ही पुलिस लाइन में दीप सजाने का काम शुरू हो गया था। मैदान में अलग-अलग स्थानों पर दीपमालाएं तैयार की गईं। जैसे-जैसे शाम हुई, दीप प्रज्ज्वलित होने लगे और देखते ही देखते पूरा परिसर रोशनी से भर गया।
इस अवसर पर लोगों ने उन वीरों को याद किया, जिनके बलिदान से देश की सीमाओं की सुरक्षा और तिरंगे का सम्मान कायम है। कार्यक्रम में शामिल हर व्यक्ति ने दीप जलाकर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।
यह आयोजन उन परिवारों को सम्मान देने का भी प्रतीक बना, जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपने प्रियजनों को खोया है। दीपों की हर लौ उनके त्याग और साहस को याद करने का संदेश देती नजर आई।
एक मंच पर नजर आई काशी की सांस्कृतिक विविधता
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसमें शहर के अलग-अलग समाजों और पेशों से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। अधिवक्ता, शिक्षक, विद्यार्थी, चिकित्सक और रेलवे समेत कई विभागों के कर्मचारी आयोजन में पहुंचे।
मारवाड़ी, सिंधी, अग्रवाल, बंगाली, माहेश्वरी, मराठी, पंजाबी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, ओडिया और मैथिली समाज के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं और पहनावे ने आयोजन को सांस्कृतिक रंगों से भर दिया।
लोक संस्कृति के जरिए किया गया वीरों का स्मरण
बलिदानियों को समर्पित इस आयोजन में विभिन्न भाषाओं के लोकगीत और लोकनृत्य भी प्रस्तुत किए गए। इनके माध्यम से वीर सपूतों के त्याग और देश के प्रति समर्पण की गाथा को याद किया गया।
विभिन्न समाजों के लोगों ने इन प्रस्तुतियों के लिए पहले से तैयारी की थी। इस दौरान काशी की सांस्कृतिक पहचान और विविधता एक साझा राष्ट्रीय भावना के रूप में सामने आई।
1.51 लाख दीपों से सजी यह दीपमालिका इस बात का प्रतीक बनी कि देश अपने वीरों के बलिदान को नहीं भूलता। काशी ने एक बार फिर सामूहिक सहभागिता के जरिए बलिदानियों और उनके परिवारों के प्रति सम्मान व्यक्त किया।
