अदालत ने आपराधिक मामलों वाले नेताओं की मंत्री पद पर नियुक्ति के लिए अलग दिशा-निर्देश बनाने से इनकार किया।
क्या गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे किसी विधायक को मंत्री या कैबिनेट में जगह दी जानी चाहिए? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश तय करने से इनकार कर दिया है। अदालत में दायर याचिका में मांग की गई थी कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मंत्रियों का चयन करते समय उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें और इस प्रक्रिया के लिए कुछ निश्चित मानक बनाए जाएं।
शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता संवैधानिक नैतिकता की बात कर रहा है, लेकिन यह बाध्यकारी नहीं है। पीठ ने यह भी माना कि इस विषय पर न्यायिक दिशा-निर्देश बनाना कई व्यावहारिक और संवैधानिक सवाल खड़े कर सकता है।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
याचिका के माध्यम से अदालत से कहा गया था कि प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को मंत्रियों की नियुक्ति के समय उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि पर विचार करने के निर्देश दिए जाएं। इसमें खास तौर पर गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे विधायकों को मंत्री बनाने और उन्हें कैबिनेट में पद देने के लिए स्पष्ट मानक निर्धारित करने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इस संबंध में कोई नियामक ढांचा मौजूद नहीं है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 के तहत निर्धारित नियुक्ति व्यवस्था में नई अयोग्यता जोड़ने की मांग नहीं कर रहा है।
याचिका का जोर इस बात पर था कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते समय कुछ तय मानकों का पालन करें, ताकि मंत्रियों के चयन में उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि को भी महत्व दिया जा सके।
जस्टिस बागची ने उठाए कई सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्या बागची ने याचिकाकर्ता से कहा कि उसकी दलील संवैधानिक नैतिकता पर आधारित है, जबकि संवैधानिक नैतिकता बाध्यकारी नहीं है।
जस्टिस बागची ने यह भी सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को मंत्री पद के लिए अयोग्यता का आधार कैसे बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल लोगों के खिलाफ कई बार आपराधिक कानून का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया जाता है। ऐसा उनके राजनीतिक विरोधियों की ओर से भी हो सकता है।
अदालत ने पूछा कि क्या यह मुख्यमंत्री के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि किसी खास आपराधिक मामले की वजह से सरकार को इतनी शर्मिंदगी हो सकती है कि संबंधित व्यक्ति को कैबिनेट में शामिल न किया जाए।
सत्ता बदलने के बाद शुरू हो सकते हैं मुकदमे
पीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि राजनीतिक सत्ता बदलने के बाद कई बार नए आपराधिक मुकदमे शुरू हो सकते हैं। ऐसे में यदि अदालत मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर विस्तृत नियम बनाती है तो कई जटिल स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत यदि इस दिशा में दिशानिर्देश बनाने की कोशिश करती है तो वह एक मुश्किल क्षेत्र में प्रवेश करेगी। उनके मुताबिक, किसी मामले में आरोप लगना और किसी व्यक्ति का दोषी साबित होना अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक परिस्थितियों में दर्ज होने वाले मामलों को भी ध्यान में रखना होगा।
याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि उसका उद्देश्य कार्यपालिका की संवैधानिक शक्तियों को चुनौती देना नहीं है। वह केवल मंत्रियों के चयन और विभागों के आवंटन में विवेकाधिकार के इस्तेमाल के लिए कुछ मानक चाहता है। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी।
अमन शर्मा की मौत के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट सख्त
शुक्रवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया। यह मामला दिल्ली न्यायिक सेवा के अधिकारी अमन शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। अदालत ने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच से जांच की प्रगति पर स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।
अमन शर्मा 2 मई को दक्षिणी दिल्ली स्थित अपने घर में मृत पाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 30 अक्टूबर को इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद मामले को ‘न्यायिक अधिकारी (पूर्व जज) अमन शर्मा की संदिग्ध मौत के संबंध में’ नाम से दर्ज किया गया।
पीठ ने अब पुलिस से यह बताने को कहा है कि मामले की जांच कहां तक पहुंची है।
परिवार ने पत्नी और ससुराल पक्ष पर लगाए थे आरोप
अमन शर्मा ने 2018 में कानून की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद 2021 में वह दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल हुए। वह कड़कड़डूमा अदालत में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के रूप में काम कर रहे थे। अक्टूबर 2025 में उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली थी।
उनके परिवार का आरोप है कि उनकी पत्नी और ससुराल पक्ष के लोग उन्हें लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे। उनकी पत्नी भी न्यायिक अधिकारी हैं। परिवार के अनुसार, अमन शर्मा घटना से करीब दो महीने पहले से काफी तनाव में थे।
उनके पिता की शिकायत के बाद दिल्ली पुलिस ने पत्नी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। बाद में जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुलिस से जांच की स्थिति की रिपोर्ट मांगी है।
